ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Stories) • Chapter 8
पाठ का परिचय (Introduction):
'भीड़ में खोया आदमी' लीलाधर शर्मा 'पर्वतीय' द्वारा रचित एक अत्यंत प्रासंगिक और विचारोत्तेजक निबंध (essay) है। यह पाठ भारत की सबसे ज्वलंत समस्या 'जनसंख्या विस्फोट' (Overpopulation) पर करारी चोट करता है। लेखक ने अपने मित्र बाबू श्यामलाकांत के बड़े परिवार और उनकी दैनिक समस्याओं के माध्यम से यह समझाया है कि कैसे बढ़ती जनसंख्या के कारण देश में बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की भयंकर समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं।
लेखक अपने मित्र बाबू श्यामलाकांत से मिलने उनके शहर जाते हैं। यात्रा की शुरुआत से ही लेखक को 'भीड़' और 'अव्यवस्था' का सामना करना पड़ता है। रेलवे स्टेशन पर टिकट खिड़की से लेकर रेल के डिब्बे के अंदर तक केवल खचाखच भीड़ है। जहाँ जगह नहीं है, वहाँ भी लोग लटक कर यात्रा कर रहे हैं।
जब लेखक बाबू श्यामलाकांत के घर पहुँचते हैं, तो उनकी आँखें फटी रह जाती हैं। श्यामलाकांत का परिवार बहुत बड़ा है (उनकीन दर्जन भर संतानें हैं)। घर में भयंकर अभाव, गंदगी और शोरगुल है। उनका बड़ा बेटा दीनानाथ एम.ए. पास है, लेकिन सालों से बेरोज़गार है। जब वह किसी नौकरी के इंटरव्यू के लिए जाता है, तो एक पद के लिए हज़ारों उम्मीदवार खड़े होते हैं (बेरोज़गारी का संकट)।
घर में श्यामलाकांत की पत्नी बीमार पड़ी है। जब लेखक अस्पताल जाता है, तो वहाँ भी मरीज़ों की भारी भीड़ देखता है। डॉक्टरों के पास इतना समय नहीं है कि वे हर मरीज़ को ठीक से देख सकें। चारों ओर गंदगी और बदहाली है (स्वास्थ्य सुविधाओं का संकट)।
श्यामलाकांत अपनी बेटी (जिसकी शादी होने वाली है) के लिए कपड़े खरीदने बाज़ार जाते हैं, तो दुकान पर इतनी भीड़ होती है कि दुकानदार ठीक से बात भी नहीं सुनता। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि साधारण आदमी के लिए कुछ भी खरीदना मुश्किल है (महंगाई का संकट)।
लेखक को समझ आ जाता है कि बाबू श्यामलाकांत के घर के हर संकट (बीमारी, बेरोज़गारी, आवास की कमी, कलह) का प्रमुख कारण उनका बड़ा परिवार और अंधाधुंध बढ़ती जनसंख्या है। देश में उत्पादन और साधन तो सीमित हैं, लेकिन उपभोग करने वाली (कंज्यूम करने वाली) भीड़ असीमित है। अगर ऐसे ही आबादी बढ़ती रही, तो एक दिन इंसान 'भीड़ में खोया आदमी' बनकर रह जाएगा, जहाँ उसका कोई अस्तित्व नहीं बचेगा।
प्रसंग: पाठ के आरंभ में लेखक स्टेशन, बाज़ार और सड़कों पर असीमित भीड़ देखकर यह विचार करता है।
व्याख्या: लेखक का मानना है कि जनसंख्या वृद्धि एक 'सर्वग्रासी' (सब कुछ खा जाने वाली) समस्या है। इसने न केवल सड़कों और अस्पतालों को अपने कब्ज़े में ले लिया है, बल्कि बाबू श्यामलाकांत जैसे लोगों के घरों की शांति, सुख और समृद्धि को भी पूरी तरह से निगल लिया है। असीमित बच्चे पैदा करने के कारण उनका घर नर्क बन गया है।
प्रसंग: लेखक ने यह निष्कर्ष दीनानाथ की बेरोज़गारी और अस्पताल की बदहाली को देखकर निकाला है।
व्याख्या: यह पंक्ति देश की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी सच्चाई को बयान करती है (Demand and Supply)। देश में अन्न, जल, नौकरियाँ और अस्पताल सीमित संख्या में हैं, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने वाली जनसंख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। इसी असंतुलन के कारण समाज में बेरोज़गारी, गरीबी और वस्तुओं की कमी पैदा हो रही है।
प्रश्न 1: बाबू श्यामलाकांत को घर से लेकर बाज़ार और अस्पताल तक किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर: बाबू श्यामलाकांत का परिवार बहुत बड़ा है। उन्हें हर कदम पर 'भीड़' और 'अभाव' का सामना करना पड़ता है। घर में जगह की कमी और शोरगुल रहता है। बेटा दीनानाथ पढ़ा-लिखा होकर भी बेरोज़गार है क्योंकि देश में नौकरी चाहने वालों की भीड़ बहुत है। पत्नी हमेशा बीमार रहती है, लेकिन अस्पतालों में मरीज़ों की इतनी भीड़ होती है कि सही इलाज नहीं मिल पाता। बाज़ार जाने पर दुकानों में भीड़ और बढ़ती महंगाई के कारण वे अपनी ज़रूरतों का सामान भी ढंग से नहीं खरीद पाते।
प्रश्न 2: "छोटा परिवार, सुखी परिवार" — इस कथन की सार्थकता 'भीड़ में खोया आदमी' पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 'भीड़ में खोया आदमी' पाठ पूरी तरह से "छोटा परिवार, सुखी परिवार" की अवधारणा (Concept) को सिद्ध करता है। बाबू श्यामलाकांत एक उदाहरण हैं जिन्होंने बड़ा परिवार होने के कारण अपना घर नर्क बना लिया है। साधन सीमित होने के कारण बड़े परिवार में बच्चों को न तो अच्छी शिक्षा मिल पाती है, न स्वास्थ्य लाभ, और न ही उचित रोज़गार। परिवार में कलह और तनाव बना रहता है। इसके विपरीत, यदि परिवार छोटा हो, तो कम साधनों में भी बच्चों का लालन-पालन अच्छी तरह होता है, जिससे घर में शांति, समृद्धि और सुख बना रहता है।
प्रश्न 3: दीनानाथ को नौकरी क्यों नहीं मिल पा रही थी?
उत्तर: दीनानाथ (श्यामलाकांत का बेटा) एम.ए. पास है, फिर भी वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है। इसका कारण उसकी योग्यता में कमी नहीं है, बल्कि देश में बढ़ती जनसंख्या (भीड़) है। जब भी किसी दफ्तर में एकाध (एक या दो) पद खाली होते हैं, तो उसके लिए हज़ारों की संख्या में उम्मीदवार पहुँच जाते हैं। इस भयंकर 'भीड़' और 'बेरोज़गारी' के कारण दीनानाथ जैसे हज़ारों शिक्षित युवाओं को नौकरी नहीं मिल पाती।